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मन का पतंगा

इक रोज आँखें मूँदे,
यूँ ही ख्वाब में।
मन का पतंगा उड़ने लगा आसमान में।
विचारों की बयार, ले चला बादलों के पार।
कितना सुकून है इस अनोखे जहान में।
मन का पतंगा उड़ने लगा आसमान में।
सब कुछ नजर आ रहा है साफ,
दूर-दूर तक कोई नहीं है साथ।
खुद को घिरा पाया अतीत के सूने मकान में।
मन का पतंगा उड़ने लगा आसमान में।
ज़िन्दगी की किताब के, हर पन्ने खुल रहे हैं।
कुछ पन्ने पतंगा बन, मन संग उड़ रहे हैं।
सारे अधूरे काम पूरे करने के अरमान में,
मन का पतंगा उड़ने लगा आसमान में।
सहसा मन का पतंगा लड़खड़ाया,
विचारों संग टकराया।
मानों कोई, डोरी वापस खींच रहा है इस जहान में।
मन का पतंगा उड़ने लगा आसमान में।
©bhupesh-a