मन के बोल
कुछ बहता सा मेरे अन्दर है
झाकूॅ तो लगता है, समन्दर है
खामोश थका सा रहता हूॅ
किसी शिथिल हवा सा बहता हूॅ
जीवन के इन धागों से
भाव कई बुन डाले है
कोमल हृदय के कपाटों पर
जकड़े, बहुत से ताले हैं
पल मे कुम्हला जाता हूॅ
क्षण में फिर खिल जाता हूॅ
जीवन की फुलवारी में
मै भॅवरा सा मंडराता हूॅ
आशाओं की पनघट पर
मस्तक की उथली सिलवट पर
भूचाल सा उमड़ा आता है
बहती धारा की जमघट पर
मतप्रपंच की दृष्टि मे
मै शब्दों की एक माया हूॅ
बोध कराऊँ कैसे उनको
दर्पण हूॅ , विकृत काया हूॅ
मन की जर्जर पगडंडी पर
सपनों के दीप जलाता हूॅ
अरुणरश्मि के स्नानभोग से
पुष्पित होकर मुस्काता हूॅ
मन जायसी✍️