कुछ अंधेरा, कुछ उजाला ,कभी बादलों में
जब तुम मुझसे लुकाछिपी खेल खेलते हो
मै सोच में डूब जाती हूं, कहीं फिर मै खो ना दूं
कभी हम मिले तो क्या मिले हमारे बीच में
अब भी वही दूरी वही फासले ,
ना मेरे कभी कदम बढ़े और ना तुम अम्बर से उतरे।
मेरे मन की ज्वाला कांपती है कंदीलों में,
तेरे हजार रूप देखती हूं उन सुंदर कोपलों में।
जब विदा लेते हो तुम, नभ के तारें आहें भरते हैं,
ओस रोया करती है ,बूंद बनकर जो छितराती है।
©anusingh
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