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मन को बांधे वो डोर कहाँ ।

मन को बांधे वो डोर कहाँ
बिन नाचे अब मोर कहाँ
जबसे काली घटा छाई है
हर यौवन मुस्कुराई है।
झर झर बरसे सावन बदरा
हथिया मघा नक्षत्र हो अद्रा
जीवन बन कर आई है
हर तरू कली खिलखिलाई है।
टर-टर,टर-टर मेढक बोला
झिंगुर ने अपना स्वर घोला
अजब सी बन गई शहनाई है
मां सरस्वती जमीं पर उतर आई है।
पक्षियों का है जो जाति नउवा
दिया न्योता अब सबको कौवा
दृश्य सुमन नयन हर्षायी है
भैया ये कैसी ऋतु आई है।
©anuragrahi