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मन मोरा इक जोगन।

अपनी घुटन से बनी मैं जोगन,
न जाने किस किस पर मैं जोग करू,
किसके दिल में बैठ कर मैं,
न जाने कौन सा रोग करू।
आज अमावस तंत्र मंत्र यथावत की,
खुलेगी पटकथा अनसुनी कहावत की,
नयन रक्त से भरा मदहोश होगा,
शुरू होगी सिलसिला फिर अदावत की।
मानस तन पा कर मैं बड़ा धनवान हुआ,
समय चक्र से शिक्षा पा कर बड़ा ही गुणवान हुआ,
अंतः मन निश्चर जो बनी थी गूण का शौतन,
घुट घुट कर ही सही पर उसका भी विकास हुआ।
विरह वेदना से ग्रसित मन,
क्या कोई नव कार्य करे,
अपने दुख के चिरहरण को,
अब किस अवतार का ध्यान धरे।
©anuragrahi