हृदयांकन में अंकित
शब्द की लयबद्धता में सज्जित
शुद्ध प्रेम में जिसके भाव है रंजीत
वह नहीं होता आंतरिक सुखता से वंचित
दूसरों की मुस्कुराहट में जिसकी सुखता होती है निश्चित उसका व्यक्तित्व पर होता है विजयाघौष अंकित
वह नहीं होता दुखी भावनाओं से बन्धित
क्योंकि मन की स्वार्थता को जीत ,
वह बन जाता है मंजीत।।
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