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मोहब्बत के दिन...

मोहब्बत के वो दिन भी बड़े सुहाने थे ,
घूमने जाने के लिए कई बहाने थे ,
मॉलरोड में समोसा और जेड स्क्वायर तक पैदल जाना होता था,
और भी मित्र साथ थे उन सबका आना होता था ,
नानाराव पार्क तो प्रिय जगहों में से एक है ,
कटहरी बाग भी जाने जानो में से एक है ,
फिर आई मेरे पास एक्टिवा तो उससे घूमना हुआ ,
गंगाबैराज परमट और अधिकतर रोड पर
ऐसे ही निकल जाते थे ,
पर गुरु मजा तो तब ही आती थी जब हम टेंपो में जाते थे ,
फिर कोरोना ने दिल तोड़ दिया ,
कॉलेज के रास्तों से हमने मुंह मोड़ लिया ,
पर शुक्र था तब खुदा का की मोहब्बत की निगाहें सुकून में जीती थी ,
क्योंकि तब वो पगली मेरे घर के बगल में रहती थी ,
खिड़की से उसकी आवाज आती थी और कभी कभी दिखना होता था ,
अफसोस ये की मेरा नीचे वाले पोर्शन पर रहना होता था ,
वो रहती थी छत पर उसका दीदार होता था ,
उस समय की बात ही अलग थी महोदय
रास्ते पर आते जाते नीचे से उसे देखने का इंतजार होता था ,
कॉलेज हो या न हो उस शख्स से मिलना होता था ,
वो टेंपो के चलने पर झटके से हिलना होता था ,
कहती थी वो इधर खिसक कर बैठो मैं उस तरफ बैठूंगी,
उसका कारण मात्र इस तरफ कोईअनजान पुरुष सवारी होती थी,
फिर बार बार वो हाथ सामने लाती थी ,
मैं न ध्यान दूं तो वो जैसे मानो रूठ जाती थी ,
दरअसल वो अपनी नेलपेंट दिखानी चाहती थी,
मैं पागल अपना फोन निकाल उस पर व्यस्त हो जाता था ,
फिर मजबूरन उसे मेरा फोन छीनाना पड़ता था,
जब पूछो कि क्या हुआ तो देखो हाथ जुंझलाते हुए कहती थी ,
मैं कमबख्त तब भी पूछता था क्या है 😅
फिर ध्यान जाता अरे nail paint तब तक तो बहुत देर हो जाती थी ,
क्या सोच रहे हो ?वो मुझसे रूठ गई होगी और मुझे मनाना पड़ा होगा ,
नहीं यही तो खासियत है उसमे कभी रूठी ही नहीं,
उसकी फूटी किस्मत की मैं उसे मिल गया ,
उसका मासूम चेहरा मेरी बदतमीजी से उतर गया,
पर फिर से वो उसी मन से बोलने लगी ,
पगली जानती थी कि जरूरी काम होगा ,
और ये भी अच्छे से जानती थी कि अभी आगे टाटमिल चौराहे पर जाम होगा ,
तब तक शायद फोन रख दूंगा मैं खुद ही पर मैं ठहरा mindless person मुझे फोन चलाए बिना कहां आराम होगा 😅।
खैर इन सब की अब वो आदी हो चुकी थी ,
अब वो कुछ न कहती थी मैं समझता था वो अंदर से रोती थी पर पूछने पर कुछ नहीं हुआ है कहती थी ,
मैं जैसे ही उसका हाथ पकड़ता था मानो आंसू बाहर आ रहे हों , उनको संभालते हुए वो मेरे कंधे पर सिर रख लेती थी,
और कॉलेज पहुंचते पहुंचते वो जन्नत की सैर कर लेती थी ।
अब उतरे कॉलेज पर लड़कियां बहुत होती थी ,
पर वो पगली सब कुछ जानकर भी कुछ न कहती थी ,
मैं सब समझता हू इसीलिए ये बयां कर रहा हूं,
उसके दिल पर रहता था सब पर वो बयां ना करती थी ,
मैं भी उसे चिढ़ाने के लिए किसी के पास खड़ा हो जाऊं ,
जब वो देखे तो अपनी नजर को जानबूझ कर दूसरी लड़कियों पर घुमाऊं, 😅
हां एक शिकायत थी उसको की व्यस्त होने पर उस पर ध्यान नहीं देता था ,
पर क्या ऐसा हो सकता है कि अपनी छाया पर ध्यान न जाए ,
लेकिन मैं भी कुछ ज्यादा उसे सिर पर नही चढ़ाना चाहता था ,इसलिए मैं उसकी सारी बातें नहीं मानता था ,
पर अब भी वही सिलशिला जारी है बस अब कॉलेज नहीं है ,
ये समस्या भारी है ,
अध्यापिका बनने का प्रयास उसका जारी है ,
शायद जल्द ही किस्मत उससे कहने वाली है
कि चलो अब मैडम आपकी बारी है,
सोच रहे होगे मैं क्या करता हूं,
पढ़ाता हूं मैं भी पर वो मुझको पढ़ाती है ,
शांत रहकर सब सहन करना वो मुझे सिखाती है ,
वो सिलसिला था जो थमता नहीं था हर रोज मिलने पर भी,
आज थम गया है क्योंकि अब जिंदगी बनानी है ,
किस्मत में क्या है वो तो खुदा ही जाने,
विवाह तक बात जायेगी ये हम दोनों कैसे मानें,
एक तो आज भी इस समाज में जातिप्रथा प्रचलित है,
सामने नहीं आती पर अंदर ही अंदर चलित है,
अगर बन जाए वो कुछ तो शायद समस्या का हल मिले ,
सरकारी हो गई तो क्या बात है मुझे भी कुछ बल मिलें,
सब कुछ जिंदगी में मिलने की चाह भी नहीं है ,
दो जिंदगी बर्बाद होंगी ये परवाह भी नही है,
घर वालो का दोष नहीं उनकी बातें भी जायज है ,
अब जिंदगी बनाने की राह पर कुछ त्याग की रायज है,
जब धन नहीं होगा तो जमाने को क्या जवाब दोगे ,
पैसा हो जाए तो उनका मुंह तारीफों से पाट दोगे ,
ठीक है सब बाते सही हैं ,अब वो देर तक चैटिंग की रातें नहीं है ,
जिम्मेदारियों का बोझ है कभी रोना आता है ,
कभी कभी न रातों को सोना आता हैं,
बस पूछ लेते हैं हाल कैसे हो ,
उस पर वो खुश हो जाती है ,
पगली नासमझ तो नहीं है क्युकी वो मुझे सिखाती है ,
अब परीक्षा है इस जीवन में आसमान छूने की ,
पूर्ण विश्वास है वो पगली जरूर जीतेगी,
फिर बाकी बातें होंगी बाद में अब ज्यादा भाव विभोर नहीं करूंगा
,
मिलेंगे जीवन के अगले पहलू में,
जहां बात होगी कितना कमाते है ,
क्या हम दोनो जिंदगी साथ बिताते है ????
बुझे_मन _से
अमन शुक्ल


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