मोहलत-ए-प्यार
बेवफ़ाई का तमाशा बना, और मैं किरदार बन गया हूँ,
मोहब्बत की सजा क्या है, इस सवाल का जवाब मत दे।
तुझे खुदा समझा था मैंने, यूँ लब खामोश हैं मेरे,
दिल-ए-ज़ख्मों का अंबार हूँ, फिर से मोहलत-ए-प्यार मत दे।
जिन गलियों में साथ चलता था, तेरा हाथ थामे सुकूं से,
उन वीरान पड़ी गलियों को अब, फिर से पुकार मत दे।
इक अल्फ़ाज़ था “हम”, जो अधूरा किस्सा रह गया,
मेरे नाम से मेरे गाँव मे , तेरा कोई इश्तिहार मत दे।
जिन राहों पर तुझे पाया था, फिर से वहीं भटका हुआ हूँ मैं,
मुझ भटके हुए राही को तू अब, मंज़िल का रास्ता मत दे।
ख़ुद को समेट लिया है मैंने, ख़ामोशी भरे लम्हों में,
मेरे जख़्मों को कुरेदकर अब, कोई नया घाव मत दे।
© विशाल सैनी
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