आब-ए-चश्म से ये आँखें नई हो जाती है,
पतझड़ के बाद पेड़ पौधे जैसे नई हो जाती है।
न छुपाया करो दर्द-ए-जिगर को हद से ज्यादा,
बेसमझ बीमारियां भी अक्सर नई नई हो जाती है।
शायद तेरे गमों को किसी नजराने की जरुरत हो,
जो तेरे चेहरे पर हमेशा खिली हुई रहती है।
रूसवाईयां तो रहती है कभी गिला नहीं करती मगर,
खोई हुई ये आंखें किसी की याद में नम हो जाती है।
जिंदगी की ये पहेली सुलझाने से ही सुलझेगी,
जैसा रंग भरोगे वैसा ही तुम्हें रंग मिलेगी।
यूं तो अनुराग एक नामचीन बादाकश है मगर,
कहीं भी किसी से दोस्ती दिल्लगी हरदम हो जाती है।
©anuragrahi
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