मुद्दतों से इंतज़ार किया है मैंने तेरा,
बरसों अश्क बहाए हैं तेरी याद में।
हर रोज़ खुद को थका कर,
हर शब आँखों को भिगो कर,
तेरी राह तकती रही हूँ…
चौखट पर बैठी,
हर आहट पर दिल ठहर सा जाता था,
हर रोज़ मेरा दिल बस तुझे ही सदा देता था।
और जब वो लम्हा आया…
जब तू रूबरू था,
यूँ लगा जैसे इंतज़ार मुकम्मल हुआ,
जैसे अब हर ज़ख्म को मरहम मिल जाएगा।
चंद बातें ही तो हुई थीं,
नज़र भर कर एक-दूजे को देखा भी न था,
कि तेरी ज़िम्मेदारियों ने
फिर तुझे पुकार लिया…
और मैं…
फिर से तन्हा रह गई।
फिर उसी इंतज़ार में,
दर पर निगाहें जमाए,
चौखट से दिल लगाए
बैठी हूँ…
उसी तरह।
-शिवन्या
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