S

मुहब्बत की कि मुहब्बत से खुशबू आती है बू नहीं आती खाली जेब क्या हुआ कभी कभी…

मुहब्बत की कि मुहब्बत से खुशबू आती है बू नहीं आती

खाली जेब क्या हुआ कभी कभी ख़त आता है तू नहीं आती

खिलाड़ी हूं तो वैसे मैं नामचीं ताश के सभी पत्तों का

बाज़ी पैसों की लग जाए बाज़ी हक़ में नहीं आती

नवाजा है खुब ख़ुदा ने मुझे अपने मेहरबानी से

किरदार कोई भी मैं पकड़ूं मंजिल तक नहीं आती

सुना है ठेस लगने से आंखें खुल जाती है

फिर चट्टान अंधों की राह में क्यूं नहीं आती

शहर-ए-इश्क रौशन है जुगनू-ए-मुहब्बत से

जाने मेरे घर ऐसी रोशनी कभी क्यूं नहीं आती।