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मुझ मरीज-ए-इश्क को क्या क्या नहीं दिया।

मुझ मरीज-ए-इश्क को क्या क्या नहीं दिया,
कुछ न और बोलकर और दर्द बढ़ा दिया।
बस तुम से बात की फकत दिल को आश थी
खुद से तुझे रूठा कर ये मौका भी गंवा दिया।
इक इंतजार के सिवा तेरे इन्कार के सिवा
मुझको तुझसे क्या मिला मुझे खुदा ने क्या दिया।
ये हुस्न भी अजिब है नहीं हर किसी के नसिब है
जब जिसे जां से जियादा चाहा उसने हमें ठुकरा दिया।
न थी खिजां की रोकथाम मेरे इख्तियार में
भरी बहार में हमने अपना चमन लुटा दिया।
नक्श-ए-वफा तो अनुराग ही था अब ढुढती हों कहां
ग़लत हर्फ तुने पढ़ लिया और उसे मिटा दिया।
©anuragrahi