मुझ पर एहसान है किसी जिंदगी का
नहीं तो ये जिस्म जल गया होता कभी का।
आप समझ नहीं सकते मेरी ये मजबूरी
मैं दोस्त तो हूं,फ़र्ज़ अदा नहीं किया दोस्ती का।
कितने ख्याल दिल में आए बस ख्याल बन के रह गए
कभी देखा होता आईने में शक्ल इस बेबसी का।
लोग दुर बहुत निकल गए मैं खड़ा वहीं रह गया
जंजीर तो इतनी भारी नहीं थी हथकड़ी का।
है लाख टके सही वहां भी काम आती है मुहब्बत
जहाॅं पर कोई नहीं होता किसी का।
अनुराग!आ रही है रफ्ता रफ्ता बालों पर सफेदी
और हर रोज़ उम्र फिसल रही है जिंदगी का।
©anuragrahi
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