मुझ पर किसी रूह का असर है मैं क्या करूं
ये दिल बेचैन अब शाम-ओ-सहर है मैं क्या करूं?
जि करता है जला के ख़ाक कर दूं शहर को
मगर वहां उनका भी घर है मैं क्या करूं?
चोट उनको लगें दर्द हमें होता है मगर ऐसा उसे नहीं
एक उनका जिगर है एक मेरा जिगर है मैं क्या करूं?
मैं सौ बार उसे चाहूं और वो एक बार भी नहीं
क्या मेरे चाहत में कसर है मैं क्या करूं?
फुल अहबाब के खिले थे मगर क़ायम नहीं रहा
हम पर किसी की बुरी नज़र है मैं क्या करूं?
न बोलना उनका बेवजह यूं ही खफा रहना
अनुराग के लिए ये मिठा ज़हर है मैं क्या करूं?
©anuragrahi
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