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मुझे अब घर बुलाने से हर लोग बचते हैं।

मुझे अब घर बुलाने से हर लोग बचते हैं
कहीं कुछ मांग न लूं दोस्त भी डरते हैं।
कौन कब कहां होगा कोई नहीं बता सकता
कुछ प्रदेश में तो कुछ सरजमीं पे मरते हैं।
हर कली सुबह देखती है हर फुल शाम देखता है
सिलसिला बदलने का जिवन में चलते रहते हैं।
कोई आइना नहीं कि मैं अपना मुस्तकबिल देख सकूं
कोशिश मंजिल तक की पां तय करते रहते हैं।
जिंदगी तुम्हें क्या मिला मुझे यूं गुमनाम रखकर
अखबारों में आने को हम बचपन से ही तरसते रहते हैं।
©anuragrahi