मुझे देवी मत बनाओ…
क्योंकि जब तुम मुझे देवी बनाते हो,
तब तुम मुझे इंसान रहने नहीं देते।
मेरे माथे पर तिलक लगाते हो,
और मेरी ज़िंदगी पर त्याग लिख देते हो।
तुम्हारे लिए मैं शक्ति हूँ —
पर सिर्फ तब तक,
जब तक मैं सह रही हूँ।
जब मैं बोलती हूँ,
तब तुम्हें मेरी आवाज़ बदतमीज़ी लगती है।
तुम मुझे मूर्ति बना देते हो,
पत्थर की…
ताकि मेरे दिल की धड़कन तुम्हें सुनाई न दे।
क्योंकि अगर तुमने मेरी धड़कन सुन ली,
तो तुम्हें अपनी सोच का शोर सुनाई देगा।
मेरे आँसू आवाज़ नहीं करते,
इसलिए तुम्हें परेशान नहीं करते।
वे चुपचाप गिरते हैं —
रात के अंधेरे में,
जब मैं खुद से भी नज़रें चुरा लेती हूँ।
नवरात्र में तुम मुझे सिर पर बिठाते हो,
मेरे पैर छूकर आशीर्वाद माँगते हो,
और दस दिन बाद…
मुझे पानी में बहा देते हो।
जैसे स्त्री का सम्मान
सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख हो।
तुम्हें घर में देवी चाहिए,
पर बेटी नहीं।
दुर्गा चाहिए — पर तलवार बिना सवाल की।
सरस्वती चाहिए — पर ज्ञान बिना आवाज़ का।
लक्ष्मी चाहिए — पर खुद के सपनों पर हक़ नहीं।
तुम्हें माँ चाहिए — जो जन्म दे।
बीवी चाहिए — जो सह ले।
पर बहन और बेटी नहीं,
क्योंकि वहाँ तुम्हें इंसान बनना पड़ता है।
कभी देखा है उसका तकिया?
जहाँ आँसू इतने दफ़्न हैं
कि कपड़ा भी सच जानता है।
कभी उसकी आँखों के काले घेरे पढ़े हैं?
वह थकान नहीं —
अपने अस्तित्व को रोज़ दबाने की कीमत है।
उसकी खामोशी को तुम संस्कार बोलते हो,
उसके डर को मर्यादा।
पर सच यह है —
तुमने उसे जीना नहीं,
सिर्फ सहना सिखाया है।
कितना दबाते हो तुम…
कितना तोड़ते हो…
और फिर बराबरी का गीत गाकर
खुद को महान समझ लेते हो।
पर अब सुनो।
आज मूर्ति बोल रही है।
आज खामोशी टूट रही है।
आज वह स्त्री खड़ी है
जो विसर्जित होने से इंकार करती है।
मुझे पूजा नहीं चाहिए।
मुझे दया नहीं चाहिए।
मुझे बराबरी भी भीख में नहीं चाहिए।
मुझे मेरा हक़ चाहिए —
पूरा, बिना शर्तों के।
मैं देवी नहीं हूँ।
मैं इंसान हूँ।
और जब इंसान अपनी कीमत समझ लेता है,
तो समाज की नींव हिल जाती है।
याद रखना —
जिस दिन स्त्री ने डरना छोड़ दिया,
उस दिन इतिहास लिखा नहीं जाएगा…
बदल दिया जाएगा।
-शिवन्या
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