मुझे जितना कमज़ोर समझती है दुनिया उतना हूँ नहीं
नासमझी यह है कि खुद को मैनें कभी समझा नहीँ
यूँ तो सभी से उनकी ख्वाहिश पूछता रहता हूँ
अपने दिल से कभी उसकी ख्वाहिश पूछा ही नहीं
कहते हैं कि अच्छे इंसान की तलाश खुदा को भी है
मुझमें क्या कमी है जो अब तक मैं मरा नहीं
ऐ खुदा आखिर कयूँ जिंदा रखें हो इस जमीं पर
जब कोई खुशी मेरे हिस्से रहा ही नहीं
आज दिल-ओ-जां लगा दी तो कुछ पैसे कमाएं
जेब फटा था राही घर आते कुछ बचा नहीं।