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मुझे नहीं पसंद कोई नियम, कोई रीत-रिवाज़, कोई त्योहार... क्योंकि मैंने देखा…

मुझे नहीं पसंद कोई नियम,
कोई रीत-रिवाज़,
कोई त्योहार...

क्योंकि मैंने देखा है—
लोग दीप जलाते हैं,
पर अपने ही रिश्तों को अंधेरों में छोड़ देते हैं।

घर के आँगन रंगों से भर जाते हैं,
मगर मन बरसों से सूने पड़े रहते हैं।

मैंने देखा है,
लोग परंपराओं के नाम पर
अपनी इच्छाओं की चिताएँ जलाते हैं,
अपने सपनों का गला घोंट देते हैं,
और फिर उसे
"संस्कार" कहकर गर्व से जीते हैं।

मुझे नहीं भाते वो नियम,
जो किसी की हँसी छीन लें,
जो किसी की उड़ान काट दें,
जो किसी को जीते-जी
सिर्फ़ निभाने के लिए जीने पर मजबूर कर दें।

मुझे नहीं पसंद वे रीतियाँ,
जो औरतों की इच्छाओं को
मर्यादा का नाम देकर दफना देती हैं,
जो पुरुषों के आँसू छीनकर
उन्हें कठोर होने का श्राप दे देती हैं।

इसलिए...

अगर किसी परंपरा में प्रेम नहीं,
किसी नियम में सम्मान नहीं,
किसी त्योहार में अपनापन नहीं,
और किसी रिश्ते में मन की शांति नहीं—

तो वह मेरे लिए
उत्सव नहीं,
एक खूबसूरती से सजाया गया बंधन है।

मैं उन त्योहारों से दूर ही अच्छी हूँ,
जहाँ घर तो रोशनी से जगमगाते हैं,
मगर लोग भीतर से बुझ चुके होते हैं।