सुनो सुनाता हूँ इक कहानी,
मुझसे रूठ गई इक मेरी रानी।
कभी हमेशा आती थी वो मुझसे लेने क्रिम,
मिठी मिठी पपियां देकर खुब दिखाती थी ड्रिम।
मैं पैंतीस और वो पच्चीस उम्र में दस का था अंतर,
भला मैं क्या जानु नाटी कद में कुट कुट की भरी थी मंतर।
मैं उन्मादी निश्छल मन का पहले कभी न किया प्रेम,
नए प्यार की सिग्नल देखकर दिल में खुब बनाया फ्रेम।
हवा रूहानी था समय जवानी खुब चढी परवान,
बाहों में जब कसती थी तो डोला देती थी ईमान।
मेरे प्यार का सहारा लेकर मुझसे रखा इक प्रस्ताव,
बढ जाएगी और प्रेम गर पुरे कर दो कुछ मेरे सुझाव।
मेरा घोड़ा तो दौड़ रहा था, कहा तू मांग ले आज जानेमन,
एकलव्य से जैसे थे द्रोण मांगें वैसे मांग लिया बड़ा रकम।
जैसे मिले हो उसे वर कोई, बदल गए रंग रूप सुर और ताल,
पतित पावन मेरे शुद्ध प्यार को ठुकरा कर, कर दी मेरा बुरा हाल।
आज प्रार्थना ईश्वर से कि मुझे भी कोई फल दे,
मेरी पुजा से खुश होकर इस विरह को मित मिलन में बदल दे।
©anuragrahi
S