मुक्तसर खुद ही मैंने अपनी जिंदगी कर ली,
तमाम उम्र की अपनी दफन खुशी कर ली।
है रश्क मुझसे बहुत अब इस जमाने को,
जो करिब मुझसे थे उनसे खत्म दोस्ती कर ली।
क्या गम क्या जुदाई अब सताएगी हमें,
जो हमने ताउम्र न मिलने की कसम कर ली।
ये नादां दिल अब भी उन्हें अपना कहता है,
जिसने हमसे बेहिचक बेवजह दुश्मनी कर ली।
©anuragrahi
S