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मुसाफ़िर

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वक़्त की हर जंजीर पर
लिखी ख़्वाबों की तस्वीर है
मनवा-पागल कब तक बचाएँ
जब नियति जीवन का नीर है।
जहाँ कर्म रचे मेहनत की रेखा
वहाँ व्यर्थ बैठना बेकार है
परिश्रम हाथ का अपना धर्म है
मुस्किल मात्र सोच नर्म है।
चला मुसाफ़िर रस्ते पर जो
आखिर कहीं तो जाएगा
आँख मूँदकर सोने वाला
बस सोता ही रह जाएगा।
जीवन खुद मेहमान जगत का
मौत से किसको डराएगा
चट्टानों से टकराकर बादल
मेघ इंद्र कहलायेगा।।

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©mkyadav