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मुसाफिर

धरती का हूँ मैं मुसाफिर,
जन्म से ना हूँ मैं कामिल;
सीखने को निकल चला मैं,
शागिर्द हर किसी का बन चला मैं;
बाद इसके मुख्तालिफ लोगो में
शुमार हो चला मैं
और मुकम्मल होने की चाह में
बर्बाद हो चला मैं;
©candor