न कर आपबीती का इजहार चुप हो जा
कौन है किस से है इसरार चुप हो जा।
अब न आऐंगे रूठने वाले यहां
न गिरा अश्कों को बार बार चुप हो जा।
ऐ दिल-ए-बे-करार रश्क न कर
जा चुकीं है जिंदगी से बहार चुप हो जा।
मुनासिब है छुपा ले जख्मों को फकीरों के मुआफिक
है नहीं यहाँ कोई तेरा गम-गुसार चुप हो जा।
किसी की ख्वाहिशें फरमाइशें कर्ज बन कर रह गई
चुकाऐंगे हर आरजू को अगली बार चुप हो जा।
राह-ए-मयकदा ही अब फकत है सुकून-ए-जिन्दगी
गिर गई मय-ओ-तेरे बिच की दिवार अनुराग चुप हो जा ।
©anuragrahi
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