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न मिला कभी मुझे मेरे हक का मेहनताना ।

न मिला कभी मुझे मेरे हक का मेहनताना
जाने क्यूँ अब हमसे हैं दूर हो रहा सब नजराना।
इश्क की तहजीब ने है हमें ये सिखलाया
महबूब की खुशी के लिए हर खुशी तुम ठुकराना।
लगी हो जिन्हें बेअक्ली इश्क का जब ये रोग
जायज नहीं फिर कुछ कहना या समझाना।
हम मकतल तक रफ्ता रफ्ता चल चले आए हैं
अब सर कटे या पां यूंही क्या घबराना।
हमें निकालना मुमकिन नहीं बेखुदी से अब यारों
पि जो गया हूँ साकी के हाथों सारा मयखाना।
शायद वो भी अब समझने लगे हैं मुझे अनुराग
जैसे समझता है बहशी पागल ये जमाना ।
©anuragrahi