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न शोख-ए-मन आए न शबाब आया ।

न शोख-ए-मन आए न शबाब आया
यार के गली से न कोई जबाव आया ।
न निंद आयी न ख्वाब-ओ-ख्याल आया
बस याद तेरी दिन रात बेहिसाब आया।
ना-दीद रही तू ना-मुराद रहा मैं
देखना चाहा जब सामने हिजाब आया।
तुझे ताउम्र चाहूं मैं और बाउम्र जीयो तुम
ये गम जो मेरे हिस्से इतने शादाब आया।
मदहोशी में हूं या है खुदकुशी का आलम
बेहोश पड़ा हूं जबसे हाथों में शराब आया।
ये कैसा सजदा है ये कैसा रतजगा है
अनुराग पर रहम के बदले में है अज़ाब आया।
©anuragrahi