ना जाने क्या जादू है तेरी आँखों में,
डूबे हैं इस तरह कि संभलना भूल गए,
किनारों का ख़याल तो आता रहा मगर,
तेरी गहराइयों को छोड़ना भूल गए।
जितना निकलना चाहा उन लम्हों से,
उतना ही और उलझते चले गए,
जैसे समंदर पुकारता हो बार-बार,
और हम हर पुकार पर बहते चले गए।
ना जाने क्या असर है तेरी बातों में,
दिल हर दफ़ा तेरे पास ही लौट आता है,
दूर जाने की लाख कोशिशों के बाद भी,
तेरा नाम ही उसे घर बुलाता है।
फँसे तो थे बस एक मुस्कुराहट में,
सोचा था ये जादू पलभर का होगा,
पर अब हर धड़कन में तू यूँ बस गया है,
जैसे दिल का होना ही तेरा होना होगा।
ना जाने क्या हुनर है तेरी मुस्कान में,
कि वक़्त भी ठहर कर तुझे देखता है,
और मैं…
हर गुजरते पल में थोड़ी -थोड़ी
खुद से दूर होती रहती हूँ।
दीवाने तो पहले ही हो चुके थे तेरे,
अब खुद में भी कम होते जा रहे हैं,
तुझमें यूँ घुल रहे हैं हम,
जैसे नाम अपना ही भूलते जा रहे हैं।
-शिवन्या
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