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नादान था मैं…

बहुत दिन हो गए देखते देखते
अब मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ,
नादान था मैं….
नहीं था अंदाज़ा ज़माने के रीति रिवाज़ो का
वक़्त ने संघर्ष से सिखाया रुख परखना हवाओं का
फर्क नहीं पड़ा मुझपे दूसरों की बद्दुआओं का
अपनों ने ही किया क़त्ल मेरी इच्छाओं का
 
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©vikasgarg