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नादानीयाँ

जरा सी धूप में कराह उठती थी वो, अब तो धूप की कराह से जरा सा भी भय नही, पता नही मौसम शिथिल पड़ गए हो या सहने की झमता बढ़ गये हैं।।
©divya jyoti