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नाम लेकर के तुम्हें पुकारना कुछ आसां नहीं ।

नाम लेकर के तुम्हें पुकारना कुछ आसां नहीं
हर शाख पर तेरे नाम की पंछी है तेरी पहचान नहीं।
ख्वाबिदा चेहरे को हकीकत मैं कैसे बनाऊँ
सपने तो सपने हैं उसका अपना असल जहां नहीं।
ये पेड़ कितना अच्छा फला फुला है यहाँ
खाकसार मुझ सा इसे तोड़ दे कोई इंसां नहीं।
है लफ्ज़ ए मुहब्बत तेरे इज्ज़त ओ आबरू में
वगरना मेरे घर गैरों का सम्मान नहीं।
आज से तूझे मैं बुलाउं ऐसे हालात न होगें
दिवारें भरी है तस्वीर से तेरे न आने से ये घर विरां नहीं।
©anuragrahi