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निगाह-ए-नाज से जब देखा तुझे पहली बार।

निगाह-ए-नाज से जब देखा तुझे पहली बार
आहिस्ता आहिस्ता बढ रहा है दर्द-ए-दिल मेरे यार।
हालत-ए-हयात हो गया इस कदर बद से बदतर
समझ में नहीं आता ठीक हुँ या हो गया हूं मैं बिमार।
ये तपती धुप की ताबिश से कम नही जुदाई का ग़म
नए नए ख्याल आ कर देते हैं जिंदगी बेजार।
कभी मेरी तरह ही सोंच लिया किजिए हुज़ूर आप
नज़र आने लगेंगे छुपा हुआ इस दिल का प्यार।
हर रोज मिला करें और होंठों पे साथ तबस्सुम हो
फकत आ जाने से मिल जाता है हमें चैन-ओ-करार
©anuragrahi