निकलती जाए है जान जिस्म से आहिस्ता आहिस्ता
उनको ख़्याल आया मेरा मगर आहिस्ता आहिस्ता।
बचपन में थे बेनकाब और जवानी में हमसे पर्दा
हया अकाएक आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता।
सवाल पुछिए वस्ल की तो जताती है डर बदनामी का
दबी होंठों से देती है जबाव आहिस्ता आहिस्ता।
बहुत दिनों का जागा हूं मुझे अभी गहरी नींद सोने दो
कभी फुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता आहिस्ता।
तुम्हारे प्यार में और मेरे प्यार फ़र्क बस इतना है
कि मुझे थोड़ी जल्दी हैं और तुझे है आहिस्ता आहिस्ता।
वो बेदर्दी से सर काटे'अनुराग'और मैं कहूं उस से
हुजूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता।
इस ग़ज़ल के कुछ अल्फाज़ मेरे अपने नहीं है।
©anuragrahi
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