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नज़र नज़र की बात है नज़र से ही पढ़ा जाए।

नज़र नज़र की बात है नज़र से ही पढ़ा जाए
किताब-ए-हुस्न को ज़रा गौर से समझा जाए।
उतार चढ़ाव बदन के है जोड़ घटाव की तरह
कहीं कम तो कहीं ज्यादा ठीक से देखा जाए।
हसीनें इतना हमसे गुमान क्यूं करती है
आज़ वक्त है इसका जवाब ढुंढ लिया जाए।
क्या मर्दों की तरह नहीं होती उनके दिल में तिश्नगी
रू-ब-रू होकर ये सवाल पुछ लिया जाए।
मुहब्बत में अब तक पागल होते आए हैं लड़कें
चलो आज उन्हें भी पागल कर दिया जाए।
तुम्हें तो अनुराग आदत है रूठने और रूठाने की
आओ किसी से मनाने की हुनर सिख लिया जाए।
©anuragrahi