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नजरें टिकी रही दरिचे पर वो मुहाने से मिले ।

नजरें टिकी रही दरिचे पर वो मुहाने से मिले
ऐसे आंखों को नया इक मर्ज दिल लगाने से मिले।
हमको अपने जानिब पर खुद से गुरूर था
मेरे सिवा किसी गैर से वो न मिलाने से मिले।
इक रोज चांदनी रात में ले बदरी जब अंगराई
रिमझिम रिमझिम बुंद में दो बदन लड़ाने से मिले
हरफ मेरे गंवार है अल्फाज़ मेरे है जाहिल
मगर तुम्हारे याद में है ये हुनर चुराने से मिले।
इक नया जख्म मिला एक नई दर्द मिली
दोस्तों के शहर में जब हर एक बेगाने से मिले।
मैं कैसे मानूं कि तू उसे भुल गया अनुराग
उसके खत आज भी है तेरे सिरहाने से मिले।
©anuragrahi