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नफरत जिंदगी से

हो गई है रश्क जिंदगी से जो वो अब न रहे
ख्वाब ख्वाब ना रहे इश्क़ इश्क न रहे।
मुझ को नहीं कबुल दो जहां की ऐश-ओ-आराम
किस्मत में उनके गली की दो गज जमीं रहे।
उनके बुलाने पर करीब दोड़कर मैं चला आऊं
कम से कम ये खुदा इतना जिस्म में जां रहे।
जा और कोई इश्क़ की दुनिया तलाश कर
ऐ इश्क़ हम तो अब तेरे काबिल नहीं रहें।
©anuragrahi