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नशबंदी... इश्क की!

आज जा पहुँचा अस्पताल..
करवाने नंसबंदी इश्क की... आरजू का हूजूम लिए,
दिनरात जो चलता था!
महीने में एक-बार आकर,
घर नहीं बाबा.. चैट पर..
कह देती थी Gm, और क्या?
उसके लिए सालो मचलता था।
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बाहर खड़े होकर दालान में,
इधर-उधर फिर यूं तांका..
जैसे फसल कट गई हो सारी,
चिड़ियों के घर में ज्यूं फांका..!
धिरे से पर्ची कटवाई.. कह डॉक्टर साहब को मिलना हैं,
ये प्यार सारा खुन चुस गया, चेहरा मुरझा गया हैं,
अब इसको फिर खिलना हैं।
ऊपर से निचे, निचे से ऊपर, डॉक्टर साब ने यूं देखा,
सामने जैसे उनके खड़ा हो,
देशी दारू का ठेका।
बोले... चुतिया हो?
नहीं "मन" हमने बोला था,
सुनकर हमारा उत्तर,
उनका खून खोला था।
गुस्से में चढ़ गए ऊपर और जोर से चिल्लाए,
लाख बार मना किये पर, प्यार फिर भी कर आए।
अब कां करे हो गया, सहमकर बोले हम, कोने से,
जल्दी से नसबंदी कर दो, होगा कुछ नहीं रोने से।
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©manupandy