तेरे मिजाज में आज बदगुमानी बहुत है,
अदा-ए-हुस्न की तेरी नादानी बहुत है।
न तंज कस मेरी बेबसी पर तू इतना,
मेरे बेबस जिंदगी की जिंदगानी बहुत है।
गम के बादल तेरे सर पे भी खड़े है,
हिसाबन मुझसे कहीं वो बड़े है।
संभाल लें खुद को अपनी गुस्ताखीयों से,
तेरे मिजाज में अब भी बेईमानी बहुत है।
गम के समन्दर में अकेला मेरा ही घर है,
उसकी लहरें ही अब मेरा रहबर हैं।
न दिखा हसिन सपने अब मुझे,
बहा देने को मेरे आंखों में पानी बहुत है।
मै क्या कहूं रगबत-ए-दिल तुझसे,
कहा न जाए अब जुबानी मुझसे।
कैसे कट रही बगैर तेरे तन्हा ये जिन्दगी,
खैर छोड़ो क्या कहें ये कहानी बहुत है।
©anuragrahi
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