दिवस का अवसान समीप है
या कहूं जीवन का अवसान समीप है
हर निशा दिवस को समेट लेती है स्वयं में सदा के लिये
हर बार नव-निशा दिवस को निगलती है
प्रभात तो होता है
निशा थोड़े ही उगलती है उसे
हर दिन के साथ जीवन भी ग्रास बनता है
दिन अौर जीवन
नव प्रभात - नव जीवन
मैं विगत दिवस को अाज में जोड़ता रहा
मैं समझता रहा कि मैं वही हूं जो कल था
हह्ह!
हर नये दिन नया जीवन मिला
अौर
मै बासी को, मृत को अागे बढ़ाता रहा
रात को सो जाना
यानि दृष्टि का विलय, बुद्धि का विलय अौर अहंकार का भी विलय हो जाना आत्मा में
उस विराट में जिसमें से नया सवेरा उगेगा
तभी शायद
सुना है आत्मा अमर अजर है
हां सच तो है
प्रतिदिन विलीन हो जाता है आत्मा में
अौर जब प्रभात न होगा
तो होगी मुक्ति
. . . .
अौर मैं जन्म दिनों की गिनती बढ़ाता रहा
अहा
मैं फिर फिर जन्मा
अौर मैंने जन्म का उत्सव भी न मनाया
मृत में नवजीवन घोल प्रदूषण में जीता रहा
आज फिर समा जाऊंगा काल के गाल में
कल नया जन्म लेने को
कल जन्मोत्सव में तुम भी आना
" उमाशंकर " 🌷
©yogamity
Y