नवम्बर की आधी सर्द रात में दिमाग एक पुराने चेहरे को बुनता।
सिगरेट के भी धुंए से चेहरा उसका बनता है।
वाइट हाउस का गार्डन भी अब इतिहास का किस्सा कहता हैं।
मोती बाग के झूले अब उसकी हँसी का एहसास दिलाते हैं।।
जिस गली में कभी रहती थी मेरी ज़िंदगी,
अब वो गली वीरान नजर आती हैं।
चले आए थे उस गली में लिखने इश्क की दास्तां हम,
अब वो कविताओं में ही रह जाती हैं।।
कभी तुम मे थी राधा की सूरत,
और मुझ में थी कृष्ण की मूरत।
और उनका प्रेम भी अधूरा,
और हमारा प्यार भी अधूरा।
हमारे प्यार के सौ रंगों से तेरी-मेरी वफ़ा बनती है,
मेरे सपनों में चल जहाँ कलम भी तूझे बेवफा कहती है
नवम्बर की आधी सर्द रात में दिमाग एक पुराने चेहरे को बुनता।
सिगरेट के भी धुंए से चेहरा उसका बनता है।
A