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पैसों के दौर में रिश्तों की खिंचातनी हो गईं हैं ।

पैसों के दौर में रिश्तों की खिंचातनी हो गईं हैं
आदमी के पास अब दिल की कमी हो गई है।
फुर्सत ही कहां कोई किसी के जज्बातों को समझे
छत्ते से निकल कर जो मधु डाबर हनी हो गई हैं।
अब तेरे दर्द तेरी आपबीती सुनने को फकत दिवार हैं
इंशां के दोनों कान नशतर से राग-ए-सनासनी हो गई है।
हमनें लिहाज से सुनाना चाहा याद-ए-वफ़ा-ए-यार की
साहब उठ कर चल दिए जैसे उनसे बेईमानी हो गई है।
कौन करेगा इश्क क्या अब कठपुतलियां ही करेंगे प्यार
हमें तो जिस्म से मतलब ये इश्क याद जबानी हो गई है।
अनुराग! इश्क गम मुहब्बत जज्बात भी कोई चीज है
इस जहां से इन सब की अब निलामी हो गई है।
©anuragrahi