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"पहाड़"

जब पहाड़ो की दुनिया में हम मुसाफ़िर बन कर जाया करते हैं......
उन पगडण्डी राहो को आँखों में सजाया करते हैं.....
पेड़ों से टकराकर कुछ उनके अहसास लेकर चला करते हैं....
चट्टानों पर जब बेखौफ चढ़ा करते हैं तो खुद को मजबूत किया करते हैं.....
उन पर बनी आकृतियों और उनकी मज़बूती की जांच किया करते हैं.......
उसकी चोटी को देखकर उसकी पुकार को महसूस किया करते है.......
फिर थोड़ा चढ़कर उसके पेड़ो को हिलाती हुई हवा को चेहरे पर महसूस किया करते है.....
उसकी चोटी से जब दुनिया को देखा करते हैं उसकी खूबसूरती को आँखों में बसाया करते हैं........
उस ऊँचाई पर जब नंगे पांव चला करते हैं तो उन छोटे पत्थरो का भी अहसास किया करते है जो चट्टानों से निकलकर अपना वजूद बया किया करते हैं......
पहाड़ कुछ इस तरह समझते है हमे कि वहा रोकने केे लिए हमे राह भटकाया करते हैं ........
पर फिर उन संजोए हुए रास्तों को आँखों में भरकर हम नीचे उतरा करते है.......
खुद से उससे फिर मिलने का वादा किया करते हैं.....
फिर घर आकर उसकी यादो में मीठी नींद में सो जाया करते हैं|
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