गूंजना चाहती थी वो ..
ध्वनि चहुं दिशाओं में
प्रेम और नफरत के बीच की
लकीर मिटाना चाहती थी
ज्वाला की तेज भड़क थी उसमें
उसके ही आलिंगन में वो
खुद को समेटना चाहती थी
धूप के जैसे खिलकर
धरती में बिखरना चाहती थी
खुद की पहचान उसकी कहीं
अब गुम सी हो गई थी......
©anusingh
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