फूट फूट कर दिल का अरमां निकलता है
मैं जो देखता हूं वो बस सपना निकलता है
ये हालात किसने की किसी से क्या गिला करें
हर जगह तो सिरे से कुसूर अपना निकलता है
तुम्हारे गेसुओं में तो हजारों तारें उलझे हैं
न जाने किस शब ये चांद तन्हा निकलता है
हकीकत होकर भी ये जिंदगी हकीकत नहीं लगती
मेरे दर से ही राह-ए-मयखाना निकलता है
न आना है न आओ मगर ख्वाबों में आती रहो
सपने देख कर तो रातों का हर्जाना निकलता है
अपने आंखों पर कोई नफरत की पट्टी न बांधों
तेरे कूचे से जां हथेली पे लेकर ये परवाना निकलता है ।©anuragrahi