पीर हो पराई तो होती है मोटी रकम कमाई
वगरना सिक्के कमाने में सबने पुरी जिंदगी गंवाई।
व्यापार कोई भी हो कैसा भी हो बरकत है हिसाब से
कहाँ रहते हैं पैसे बनकर किसी का घर-जमाई।
हमनें अपने मुफलिसी का है सबब ढुंढ लिया
करते हैं खर्च जियादा और होती है कम कमाई।
दुसरों के बंगले गाड़ियां देखकर बेचारा दिल तड़पता है
न हुनर चोरी का न कत्ल का न की है और न है करवाई।
जमाने में इज्जत पाने के लिए ये सब कुछ सिखना है
अभी तक फटे-चिथड़े कपड़े ने है फकत इज्जत गंवाई।
अनुराग रहने दो बस करो केवल हालात सुधारों
वैसे लोग करते हैं अपने कर्मों का दोजख में भरपाई।
©anuragrahi
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