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पिता का बेटी को पत्र

बेटा उम्मीद करता हूँ की तुम अच्छी होगी,बेटा तुम मेरे लिए बहुत ज्यादा एहमियत रखती हो।जब तुमने इस दुनिया में आँख खोली थी न, तो मेरे कुछ करीब के लोगो का मुँह लटक गया था लेकिन बेटा मैं खुश था।उसी दिन मेरे व्यक्तित्व के दो भाग हो गए थे।एक की मैं किसी में खुल कर जी सकता था।बेटा एक आदमी बहुत ही मजबूर होता हैं वो कभी अपने भावो को प्रकट नहीं कर सकता बेटी उस आदमी के भावो का रूप होती हैं।जब भी वो आदमी परेशान होता हैं तो अपनी बेटी की तरफ देखता हैं क्योंकि उसकी परेशानी को दुनिया में वही उस आदमी के भावों को दिखला सकती हैं।इसीलिए पिता के लिए बेटी बहुत खास होती हैं शायद तभी बेटी की विदाई के समय सबसे ज्यादा दुखी उसका पिता होता हैं।और उसको सबसे ज्यादा इस चीज का दुःख होता हैं कि वो कैसे अब अपने भावो को रोकेगा अब तो वो अंदर ही अंदर घुट जायेगा।उसके पास से उसकी आत्मा विदा हो रही होती हैं न की उसकी बेटी।शायद अपनी मौत के पहले वो आदमी एक बार तब ही मरता हैं।बेटा दूसरा व्यक्तित्व उसका एक जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में निकल कर आता हैं जिससे पिता बहुत ही तेजी से अपने विकास की ओर बढ़ता हैं इसीलिए बेटी लक्ष्मी का भी रूप होती हैं ।जो एक आम से आदमी को अपने जिंदगी में कुछ करने के लिए मजबूर कर देती हैं । मेरी बेटी मैंने तुमको जो संस्कार,और जो चीजे सिखायी हैं । वो तुमको तुम्हारी जिंदगी में जीने के लिए तो काम आएगी लेकिन बेटा वो मेरे लिए भी एहमियत रखता हैं।क्योंकि तुम जैसा आचरण करोगी वैसा ही लोग मुझे देखेंगे।बेटा तुम अपनी जिंदगी में कुछ बड़ा करना क्योंकि तेरे पिता की आत्मा कितनी मजबूत हैं ये तेरे किये गए इस दुनिया में कार्य ही दर्शायेंगे।मैं याद करता हूँ तेरी बनायी गयी वो जली रोटी जो माँ के हाथ से बनी रोटी के बाद की सबसे स्वादिष्ट रोटी थी और उसके बाद वो और स्वादिष्ट होती गई।बेटा ठीक जैसे वो पहली रोटी थी।वैसे ही तुम्हारे किये गए काम भी शुरू में ख़राब होंगे लेकिन तुम्हारा जो चरित्र हैं न वो उस प्रेम का काम करेगी जिसने उस रोटी को स्वादिष्ट बना दिया था।बेटा तुम मुझको जी रही हो ये सोचकर जब कुछ करोगी तब तुम हमेशा सफल होगी।
बेटा मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ रहेगा और तेरी हार में न हारने और एक बार फिर कोशिश करने की प्रेरणा देगा वही तेरी जीत में खुद को जीता हुआ देखेगा
©शशांक शुक्ला
©shashi.