कुछ रसीली यादें थी
कुछ अनकहे वादे थे
सितम बस इतना था
मंजूर हमको सबकुछ था
ना कोई उम्मीद थी
ना ही कोई अपना था
कुछ बेगाने अपने थे
जो अपने थे वो कुछ बेगाने थे
जी रहे थे बस उसी पैमाने में
हर कोई लगा था हथियाने में
सहते गए बढ़ते गए
खुद में धैर्य रखते गए
सहमे थे , निडर भी थे
सबकी सुनते भी थे
एक वक़्त आया
सबकुछ पलट गया
बचा था कुछ तो वो बस
इंसानियत थी ।
©anusingh
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