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"पंक्तियां (मां)"

हृदय की हरकतों में ईश्वर सा अलंबन है वो
शब्दों की लिखावट से परे आत्मीय संगम है वो
सरसता की नदियों से बना समंदर है वो
नम्रता की नमी से बनी सृष्टि की गरिमा है वो
मासूमियत की माटी से सनी सरल सी प्रतिमा है वो
जन्म दिवस है जिनका आज ईश्वर की महिमा है वो
कलम की स्याही से सजी ,
इस कविता की पंक्तियां है वो ..
इस कविता की पंक्तियां हैं वो ...
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