M mannjaisy en July 23, 2025 ✍️ कोशिश कर रही हूॅ ख़ुद को ऊॅचा उड़ाने की।पकड़ कर खींच लेती है मगर ताक़त ज़माने की।इक मीसाक लेती हूॅ , फिर वो टूट जाता है।हाथों से रेत का ज़र्रा फिसल कर छूट जाता है।एक बेजान सी वादी में भटकती मै तन-तन्हा।बड़ा छटपटाती हूॅ , के वादिए गुलनार मिल ✍️©mannjaisy