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कोशिश कर रही हूॅ ख़ुद को ऊॅचा उड़ाने की।
पकड़ कर खींच लेती है मगर ताक़त ज़माने की।
इक मीसाक लेती हूॅ , फिर वो टूट जाता है।
हाथों से रेत का ज़र्रा फिसल कर छूट जाता है।
एक बेजान सी वादी में भटकती मै तन-तन्हा।
बड़ा छटपटाती हूॅ , के वादिए गुलनार मिल


✍️©mannjaisy