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भटकती आँखों से ख़्वाब देखे हैं।
आब के बुलबुलों मे इन्क़लाब देखे हैं।
खुद के वजूद की ख़बर नहीं साहब
चमन के काँटों मे भी गुलाब देखै हैं।
©mannjaisy