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प्रेम

त‌ुम कहो तो मै तुम्हें रूप की सरिता कहू,
माथे पर बिदिया की लाली प्रचि अध्रो पर मुस्कान लिए,
तुम कहो तो मै तुम्हे प्रेम की दरिया कहू
पाओ में पायल की रुनझुन झरने सा संगीत बहे,
नैनो में झिलो की गरिमा प्रेम वन्दित् मन करे,तुम कहो तो मै तुम्हे प्रेम का सावन कहू।
हांथो में मेहंदी का जादू मन को पागल सा करे,
नौ पलों सी हाथो से जुल्फ़े गिराती जब गलो पे ये आन्दोलित मेरा तेवन करे,
तुम कहो तो मै तुम्हे चाह् का फाल्गुन कहू। स्वर्णसी बाला सा बदन तुम्हारा रस में
लोत-पलोट सा रहे,
उसमें ही वशिभुत् रहूँँ,ऐसा मेरा मन कहे,
तुम कहो तो मै तुम्हे प्रेम का सागर कहू ,
तुम कहो तो मै तुम्हे प्रेम का फाल्गुन कहू‌‌‌‌‌‌‌‌‌।।

@Luckypandey
©luckypande