मैं तू हैं अद्वैत
द्वैत मे केवल अपना दर्शन
शब्द युक्त पर शब्द मुक्त है
प्रेम का यह अभिव्यंजन
रूप अरूप नही विद्रोही
बाध्य बिंब अौर दर्पण
नित्य मुक्त खेला करता है
मन अवधूत निरंजन
संवेदना को वाणी दो तो
अट्टाहास करेगी
मूक अवस्था में ही प्रियता
दैवी रूप धरेगी
जीवन को तो नेह
सदा ही प्राण दिया करता है
दर्शन को अभिव्यक्ति मिली तो
वह उपहास सहेगी
"उमाशंकर"
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